शुद्ध चैतन्य का नाम महर्षि दयानंद सरस्वती कैसे पड़ा

शुद्ध चैतन्य का नाम महर्षि दयानंद सरस्वती कैसे पड़ा

महर्षि दयानंद सरस्वती का अपने पिता से अंतिम भेंट करना 

राह मे मिले परिचित वैरागी ने अपने स्थान पर पहुंच कर करसन जी को पत्र लिख दिया । पत्र में उन्हें अवगत कराया कि आपका बेटा घर त्याग कर यहां चला आया है । उसने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया है और अब वह संतो के दर्शन करने सिदपुर मेले की ओर जा रहा है । 
पत्र मिलते ही कृष्ण जी तिवारी ने कुछ सिपाही साथ लिये और सिद्ध पुर की और अभिलंब प्रस्थान कर दिया । सिद्धपुर के मेले में जाकर उन्होंने साधुओ का हर डेरा देखा मंदिर देखें  । अंत मे वे नीलकंठ महादेव के मंदिर में जा पहुंचे । जहां संतों के बीच बैठा शुद्ध चैतन्य ज्ञान की चर्चा सुन रहा था । 
बेटे को इस वेश में देखकर कर कर्षण जी आपे से बाहर हो गए । बोले कुल कलंकी तू माता की हत्या करना चाहता है  ।पिता को देखकर शुध्द चैतन्य उठ खड़ा हुआ और उनके चरण छूते हुए बोला किसी के बहकावे में आकर मैंने घर त्याग कर दिया था । में आपके साथ चलूंगा परंतु इसे करसन जी का क्रोध शांत नही हुआ । उन्होंने उसके गेरूये वस्त्र फाड़ दिए और तुम्बा वही तोड़कर फेंक दिया । उसे श्वेत वस्त्र पहनाया और सिपाहियों को पहरे में बैठा दिया ।

पिता के कठोर पहरे से निकल भागना

 शुद्ध चेतन की आंखों में नींद नहीं थी वो उनके बंधन से मुक्त होना चाहता था । परंतु कड़ी देखरेख में घिरा था । तीसरी रात का तीसरा पहर आरंभ हुआ तो प्रहरी उघने लगे । धीरे-धीरे वे प्रकार निद्रा में पहुंच गए थे । चैतन्य हाथ आए इस अवसर को गवाना नहीं चाहता था । उसने पानी से भरा लोटा हाथ में लिया और तभी वहां से खिसक लिया । अगर कोई जाग गया तो लघु शंका जाने का बहाना उसने सोच लिया था परंतु कोई नहीं जागा ।
सिपाहियों के पहरे से निकलते ही शुद्ध तेज गति से आगे बढ़ा । अंधेरे के समय हि वह किसी सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना चाहता था । वह एक कोस चला होगा कि उसे बगीचे में मंदिर दिखाई दिया । मंदिर के साथ ही विशाल वटवृक्ष था । उसी वृक्ष के झुरमुट में मंदिर में शिखर पर छुप कर बैठ गया । कुछ ही समय बिता होगा कि नीचे किसी के पैरों की आहट सुनाई दी । सिपाही उसे ढूंढते ढूंढते मंदिर में पहुंच गए थे । एक सिपाही किसी के यहां आने के बात माली से पूछ रहा था  ।

शुद्धचेतन्य ने सतर्क हो गया उसने हिलना डुलना बिल्कुल बंद कर दिया । और उनकी बातें ध्यान से सुनता रहा । सिपाहियों को जब यह निश्चय हो गया कि यहां और कोई नहीं है तो वह आगे चले गए । शुद्ध चैतन्य ने चैन की सांस ली । वह भूखा ही पूरे दिन उस मंदिर के शिखर पर चुपचाप बैठा रहा । जल भरे लोटे के अतिरिक्त उस समय उसके पास और कुछ नहीं था  । वो धीरे से नीचे उतर आए और कच्चे रास्ते से चलकर 2 कोस दूर 1 ग्राम में रात व्यतीत की । वो पिता के अंतिम भेट कर सदा के लिए उनसे विदा हो गया था ।

शुद्ध चैतन्य का नाम महार्षि दयान्नद सरस्वती पडना

सवेरा होते ही शुद्ध चैतन्य ने फिर अपनी यात्रा आरंभ कर दी  । इलाहाबाद होते हुए भी बड़ौदा में आकर चैतन्य मठ में ठहरा  । मठ में उनकी भेंट विद्यार्थियों से हुई ब्रह्मानंद ब्रह्मचारी वेदांत के अच्छे विद्वान थे । वेदांत ब्रह्मचारी ब्रह्मानंद जी से खुलकर चर्चा हुई । 

शुद्धचेतन्य को लगा कि भोजन आदि बनाने में काफी समय बीत जाता है । इस कारण विद्या अध्ययन में बाधा पड़ती है  ।यदि सन्यास की दीक्षा ली जाए तो इस झंझट से बचा जा सकता है । इसी उद्देश्य से उसने नर्मदा नदी के किनारे घूमते हुए डेढ़ साल की अवधि व्यतीत कर दी । इस समय 25 वें वर्ष में उसने प्रवेश कर लिया था । उन्हीं दिनों से लगभग कोस भर दूर जंगल में बने ठिकाने पर एक ब्रह्मचारी के साथ दंडी स्वामी पूर्णानंद सरस्वती आ विराजे । 
उन्होने सुना कि वे अच्छे विद्वान साधु है वह उसी वेदांती पंडित के साथ स्वामी पूर्णानंद जी की सेवा में उपस्थित हुआ । उसने शास्त्र चर्चा की और संतुष्ट हुआ और उन्हीं से संन्यास लेने का निर्णय किया । श्द्ध चेतन्य ने सन्यास के लिए निवेदन किया । पहले तो उन्होंने के टाल दिया कि इन्हें किसी गुजराती साधु के सन्यास के दीक्षा लेनी चाहिए । परंतु उन्होंने और विनय करने पर उन्होंने सहमति प्रदान कर दी । विधिवत उसे ठिकाने पर शुद्ध चैतन्य को दंडी स्वामी पूर्णानंद जी ने स्वामी की दीक्षा देकर उनका नाम दयानंद सरस्वती दे दिया ।




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