भगवान ही रखवाला

पाण्डव और कौरव युद्ध के लिए तैयार थे | वे अपने युद्ध कि योजनाओं के लिए डटे हुए थे कि युद्ध कौशल के लिए किसके साथ संधि करे | पांडव और कौरव दोनों ही भगवान कृष्ण के पास मदद मांगने के लिए पहुंचे | कौरव भगवान कृष्ण के पास पहले पहुंचे | श्री कृष्ण उस समय सो रहे थे इसलिए कौरव उनलेस सिरहाने पर जाकर बैठ गए और पांडव बाद में पहुंचे और पैरो की और बैठ गए और भगवान के उठने का इंतज़ार करने लगे |जब कृष्ण जी उठे तो दोनों पक्षो ने संधि के लिए प्रस्ताव रखा |


 श्री कृष्ण ने उनके सामने विकल्प रखा कि एक तरफ भारी फ़ौज थी और दूसरी तरफ स्वयं को रखा पर उन्हीने कहा की वो पुरे युद्ध में हथियार नहीं उठाएंगे |कौरव पहले अपनी पसंद बताना चाहते थे क्यूंकि वो कक्ष में पहले आये थे | परन्तु कृष्ण में सबसे पहले पांडवो को मौका दिया क्यूंकि वो उनके पैरो के पास बैठे थे जिससे कृष्ण जी की नज़र पहले पांडवो पर पड़ी थी  |पांडवो ने भगवान कृष्ण को अपने लिए माँगा | कौरव ये सुनकर बड़े ही प्रसन्न थे क्यूंकि वो कृष्ण ही की फ़ौज चाहते थे उन्हें इस बात का डर था की कहीं पांडव सेना ना मांग लें, क्यूँकि कृष्ण तो युद्ध में हथियार उठाएंगे नहीं |इसके बाद युद्ध का परिणाम सभी जानते है पांडव जीत गए जिनके पास भगवान है और कौरव हार गए | बिना कृष्ण की फ़ौज के बिना गुरु द्रोणाचार्य के और बिना भीष्म पितामह के बिना कर्ण के पांडव जीत गए |


इस कहानी कि नीति ये है कि यदि भगवान तुम्हारे पास है तो फ़र्क नहीं पड़ता की परिस्थिति कितनी बुरी है, तुम कुछ भी खो नहीं सकते | इसलिए भगवान को अपनी तरफ करो, इस कलयुग के समय में ये आपको रक्षा करेंगे |

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