अपनों का दिया दर्द


लोहे से एक दिन पूछा सोने ने -
चोट लगने पर इतना क्यों तू चिल्लाता है ?
जबकि हथौड़ी तो मुझे भी पड़ती है ,
चोटें लगती है |
लोहे का मुख मलिन हो गया
दर्द दुनिया भर का
उसकी आँखों में समा गया |
बड़े प्यार से सोने को समझाया -
मेरे प्यारे भाई !
मैं इसलिए अधिक चिल्लाता हूँ
जब मेरा ही भाई हथौड़ा (लोहा)
मुझे ही तकलीफे पहुँचता है
तो मेरा पत्थर दिल भी कराहता है |
क्यूंकि ज़माने भर के सितम सहे जा सकते है
पर अपनों के दिए
जख्मो को नहीं भरा जा सकता है
यह कहकर लोहा दर्द से आहे भरने लगा |
जिसे देखकत सोने को उसका उत्तर मिलने लगा ||


वक़्त का पता नहीं चलता अपनों के साथ 
पर अपनों का पता चलता है वक़्त के साथ 
वक़्त नहीं बदलता किसी के साथ 
पर अपने बदल जाये है वक़्त के साथ 

Written by- Gulshan jagga 

Post a comment

0 Comments