दुल्हन की व्यथा - a Motivational Hindi Poem

दुल्हन की व्यथा को कोई ना समझा,
उसकी आरजू को कोई न जाना!
बचपन से जो सुना उसपर अमल किया,
सबकी उम्मीदों को पूरा किया !

दुल्हन की व्यथा - a Motivational Hindi Poem
दुल्हन की व्यथा - a Motivational Hindi Poem

जिन्हे बचपन से अपना माना,
वो चल दिए किसी राह पे!
जिनके सहारे अकेले छोड़ा है उसे,
ना जाने उन्हें कब तक जान पायेगी वो!

दुल्हन की व्यथा को कोई ना समझा,
उसकी आरजू को कोई न जाना!
शादी ख़ुशी का है मौका या दुःख का समय,
कुछ खुश होते है कुछ होते है दुखी!

किसकी सुने और किसकी कहे,
क्युकी अब अपने ही पराये हुए!
अब दुसरो को अपना बनाना है यारो,
बचपन की यादों को मिटाना है यारों!

मायके में जो नासमझ कहलाती थी,
ससुराल में समझदार बन जाना है उसे!
चाहे कितने भी आँसू हो आँखों में उसके,
पर ससुराल पहुंच कर मुस्कुराना है उसे!

दुल्हन का घर अब कोई अपना न रहा,
मायके और ससुराल में घर बट गया!
मायके में कहते है बेटी पराया धन है,
ससुराल में बोले क्या सीख कर आई है तू!

दुल्हन की व्यथा को कोई ना समझा,
उसकी आरजू को कोई न जाना!
आदर वो करती है सदा सबका,
पर थोड़े से सम्मान को तरसती है वो !

गलती अगर उससे हो जाये कभी,
माँ बाप के लिए सुन लेती है वो!
कितना भी दुःख हो पर खुश रहना है उसे,
क्यूंकि घर की लक्ष्मी चुना गया है उसे!

दुल्हन की व्यथा को कोई ना समझा,
उसकी आरजू को कोई न जाना! 

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