History of Pandit Jawaharlal Nehru - Pandit Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay

पंडित जवाहरलाल नेहरु देश के पहले प्रधानमंत्री कैसे बने – History of Pandit Jawaharlal Nehru



 

 
History of Pandit Jawaharlal Nehru - Pandit Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay
History of Pandit Jawaharlal Nehru - Pandit Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay



Pandit Jawaharlal Nehru – जवाहरलाल नेहरु जिनको लोग पंडित चाचा नेहरू जी के नाम से संबोधन करते हैं।  भारत में प्रधानमंत्रियों ने प्रथम स्थान तो रखते ही हैं बल्कि सर्वश्रेष्ठ स्थान भी रखते हैं। इसलिए सर्वाधिक समय तक प्रधानमंत्री के पद को सुशोभित करने वाले भी यही थे। क्योंकि वह स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अपने निधन काल तक अर्थात  15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक प्रायः 17 वर्षों तक निरंतर प्रधानमंत्री रहे ।


         पंडित नेहरू के ऊंचाई का कोई और प्रधानमंत्री या देश नहीं दे सकता।  नेहरू एक ऐसे विराट राजनीतिक शिखर थे, जिनकी ऊंचाई को स्पष्ट करना ना उनके समकालीन राजनीतिज्ञों  के लिए संभव हुआ, ना उनके बाद के।


    अभी तक तो स्थिति यह है, कि भविष्य में भी नेहरू की ऊंचाई का कोई राजनेता भारत में उत्पन्न होगा इसकी संभावना भी छेड़ है।  उसका विशेष कारण यह है , कि नेहरू जी ऐसी परिस्थितियों की उपज थी, जैसी परिस्थितियां पुनः नहीं बन सकती।
नेहरू के समय स्वतंत्रा संग्राम अपने चरम पर था। महात्मा गांधी इसका नेतृत्व कर रहे थे, उनका साथ देने वाले कुछ और नेता भी थे।  किंतु नेहरू जी उनकी दाई भुजा थे | स्वयं गांधीजी खुलेआम उनकी प्रशंसा करते थे , और उन्हें पुत्र बात मानते थे। महात्मा गांधी एक महान त्यागी महापुरुष होने के फल स्वरुप किसी पद के आकांक्षी बन नहीं थे।  स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात गांधीजी चाहते तो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकते थे। 


 किंतु उन्होंने कोई पद ग्रहण  करने  की इच्छा प्रकट नहीं कि। ऐसी स्थिति में गांधी के बाद जो सबसे विराट व्यक्तित्व था वह था पंडित जवाहरलाल नेहरू का। अतः स्वभावतः Pandit Jawaharlal Nehru प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए।

Pandit Jawaharlal Nehru Ka Jeevan Parichay

 

      नेहरू अपने समकालीन नेताओं से कई अर्थों में भिन्न और श्रेष्ठ है , चाहे वह पारिवारिक पृष्ठभूमि हो अथवा लिखाई पढ़ाई या लोकप्रियता।  स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही नेहरू की लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर की हो चुकी थी।  यह छवि उनके किसी समकालीन नेता की नहीं बनी यह सब उनके परिवारिक पृष्ठभूमि तथा उनकी विद्वता एवं वक्रता के फल स्वरुप था।


  पंडित नेहरू के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी तो थे, वह एक बहुत योग्य एवं धनाढ्य वकील भी थे।   इलाहाबाद ने उनसे बड़ा और सम्मान संपन्न कोई और वकील नहीं था।
    इसी मोतीलाल नेहरू के घर उनके एकमात्र पुत्र के रूप  में जवाहरलाल नेहरू 14 नवंबर 1889 (अट्ठारह सौ नवासी) को पैदा हुए बालक जवाहरलाल जन्म के समय ही इतनी सुंदर थे , कि उनका  नाम ही मोतीलाल ने जवाहर रख दिया।  जवाहरलाल का शारीरिक आकर्षण उनके जीवन के अंत तक बना रहा।
     इनकी माता का नाम स्वरूपरानी था। नेहरू परिवार मूलता कश्मीर का था , और उसके नाम के साथ कौल जुड़ता था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद फर्रूखसियर दिल्ली का शासक बना तो संस्कृत फारसी के कश्मीरी विद्वान पंडित राज कौल को दीवान बनाकर दिल्ली ले आया।
 उन्हें एक जगह दी गई और रहने के लिए नहर के किनारे बनी एक हवेली तभी से वह कौल नेहरू कहलाए। बाद में कौल शब्द पूरी तरह गायब हो गया रह गया, सिर्फ नेहरू यही राज कॉल जवाहरलाल के प्रथम ज्ञात पुरखे थे।


Pandit Jawaharlal Nehru Essay in Hindi

 

    Pandit Jawaharlal Nehru का जन्म तो इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू के पैतृक घर में ही हुआ था , पर बाद में उनके पिता ने एक अच्छा सा महल खरीद लिया था।  जिसका नाम आनंद भवन पड़ा बाद में यह आनंद भवन कांग्रेस पार्टी को दान कर दिया गया।  स्वतंत्रता आंदोलन का संचालन एक तरह से इसी भवन से होने लगा और यह आनंद भवन से स्वराज भवन का नाम प्राप्त कर गया।

  मोतीलाल नेहरू ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के लालन-पालन पर बहुत ध्यान दिया। एकमात्र पुत्र होने के कारण भी ऐसा हुआ। यह उक्ति प्रसिद्ध है , भले ही वह अतिशयोक्ति क्यों ना हो कि जवाहरलाल के कपड़े लंदन में सिलते थे और पेरिस में धुलते थे।  बाद में नेहरू का जीवन बहुत सादा हो गया था, पोशाक के रूप में वह चूड़ीदार पजामा शेरवानी और एक अपने तरह की बंडी पहनते, ऐसी बन्डी पहले नहीं चलती थी।  आत:  इसका नाम ही जवाहर बंडी पड़ गया।
महात्मा गांधी ने एक विशेष प्रकार की टोपी  पहननी शुरू की, तो वह गांधी टोपी के नाम से प्रसिद्ध हो गई भले ही गांधीजी ने उसे पहनना छोड़ दिया था। किंतु उस समय अधिकांश लोग ऐसी ही टोपी पहनने लगे थे, जो आज भी कुछ लोग पहनते हैं। जवाहर बंडी जो प्रसिद्ध हुई तो आज भी उसके पहनने वालों की संख्या गांधी टोपी पहनने वालों से अधिक है।
गांधी टोपी जवाहरलाल के लिए एक वरदान ही सिद्ध हुई क्योंकि वे युवावस्था में ही पूरी तरह गंजे हो गए थे।  तो फिर गांधी टोपी जो उन्होंने पहनना आरंभ किया तो देश में घर के बाहर बिना टोपी के उन्हें कहीं नहीं देखा गया।  घर में भी मुलाकात यू के समक्ष हुआ, गांधी टोपी में ही रहते थे।  यही कारण है , कि उनके उपलब्ध सारे चित्रों में भी टोपी पहने ही दिखाई पड़ते हैं।  एकाध चित्र ही ऐसे होंगे जिनमें वह बिना टोपी के और पूरी तरह खल्वाट दिखते हैं, यही कारण है कि कम ही लोगों को पता है, कि उनका सिर केस विहीन था।


Pandi Jawaharlal Nehru का लेखन परिचय


पंडित जवाहरलाल नेहरु एक बहुत अच्छे लेखक थे, अंग्रेजी में उनके प्रकाशित पुस्तकों की सूची नीचे दी जाएगी , यह यह बताना आवश्यक है, कि पंडित नेहरू ने अपने जेल जीवन का अच्छा उपयोग किया। उनके प्रायः  सारे कृतियां जेलों में ही लिखी गई । उन्होंने जेल से अपनी पुत्री को नियमित रूप से लंबे पत्र लिखने आरंभ किये । जिनके माध्यम से उन्होंने उसे अपने रूप में शिक्षित करने का प्रयास किया । बाद में यह पत्र पुस्तक मे प्रकाशित हुए , जिसका नाम पड़ा,  फादर लेटर टू हिज़ डॉटर ।  हिंदी में इसका अनुवाद प्रेमचंद्र ने पिता के पत्र पुत्री के नाम से किया।|

पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तकें हैं


  • ऑटो बायोग्राफी ( या पुस्तक 1936 में लंदन के एक प्रसिद्ध प्रकाशक के यहां से प्रकाशित हुई थी )
  • क्लिप्स एज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री (  यह पुस्तक 1939 में लंदन के ही दूसरे प्रकाशक के यहां से प्रकाशित हुई या पुस्तक उनके पत्रों पर ही आधारित थी )
  • द डिस्कवरी ऑफ इंडिया तथा ए बंच आफ ओल्ड लेटर्स (  पूजा पुस्तक 1946 में कोलकाता के सिग्नेट प्रेस से प्रकाशित हुई थी )


डिस्कवरी ऑफ इंडिया उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है, भारत के एक तरह से इतिहास के रूप में प्रस्तुत इस पुस्तक की लोकप्रियता इसकी उत्कृष्ट भाषा के फल स्वरुप विदेशों में हुई , कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ, इसके आंसर स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में भी रखे गए।


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