सुखी और सफल जीवन के लिए कम बोले ज्यादा सुनें

कम बोले ज्यादा सुनें

क्या ज्यादा बोलना अच्छी बात है ? नहीं कम बोलना अच्छा है,। मैंने बहुत बार ऐसा देखा कि लोग प्रायः अपना राग अलापते रहते हैं, बोलना शुरू करते हैं, तो शांत होने का नाम ही नहीं लेते। इससे सामने वाला चिढ़ जाता है, और फिर सुनने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रहती। 
सुखी और सफल जीवन के लिए कम बोले ज्यादा सुनें
सुखी और सफल जीवन के लिए कम बोले ज्यादा सुनें


   यह बहुत जरूरी है, कि हम पहले सामने वाले की बात को ध्यान पूर्वक सुनें यदि वह व्यर्थ ही बोल रहा है, तो भी उसे इतना समय तो देना ही चाहिए, कि वह अपनी बात पूरी कर सके। बीच में कभी बाधा ना डालें। बल्कि इसके विपरीत उसके भावों और विचारों का हमें विशेष ध्यान रखना चाहिए, और यदि वह कोई अच्छी बात कहे तो उसकी प्रशंसा करने में भी कोई हर्ज नहीं है। 

 कभी विवाद की स्थिति नहीं आने देनी चाहिए 

 कभी विवाद की स्थिति नहीं आने देनी चाहिए, ना ही सामने वालों से स्वयं को अधिक विद्वान जताने का प्रयत्न करना चाहिए तथा सामने वाले के स्वभाव तथा ज्ञान के अनुसार ही अधिक  या कम गंभीर बातें करनी चाहिए। यदि सामने वाला किसी विषय पर चुप हो जाता है, और ज्यादा बोलना नहीं चाहता, तो उसे बोलने के लिए विवश नहीं करना चाहिए, हमेशा अपने बारे में ज्यादा बात करना और अपना ही उदाहरण देने वाले व्यक्ति की बातों को बढ़कर उकताने वाला अन्य कोई विषय नहीं है। 


हमें कोई भी बात दावा करते हुए नहीं कहनी चाहिए

हमें कोई भी बात दावा करते हुए नहीं कहनी चाहिए, और उसमें सामने वाले की मनवाने की तथा अपने को अधिक बुद्धिमान जताने की प्रवृत्ति तो होनी ही नहीं चाहिए।  कठिन या समझ न आने वाले उदाहरण का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि जहां तक हो सके इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि उदाहरण विषय के अनुकूल छोटे और सरल हो।


आपकी बात चाहे कितनी ही सुंदर क्यों ना हो , यह आवश्यक नहीं है कि वह सामने वाले को पसंद जरूर आए। हमें सामने वाले की रुचि उसके व्यवहार और उसके विचार और विशेष पर ध्यान रखना चाहिए। समयानुसार शब्दों का चुनाव कर बोलना अच्छा है। सामने वाले की दृष्टि में आपका व्यक्तित्व नाटकीय नहीं है बल्कि जादुई होना चाहिए। 


अधिकांश लोग दूसरों की बातें सुनने के बजाय बोलने के मौके की तलाश में रहते हैं ।  

यह बात एक बुद्धिमान व्यक्ति अच्छी तरह से जानता है, कि अच्छा श्रोता बनना कितना महत्वपूर्ण है। अच्छी तरह सुनने की योग्यता दूसरों पर प्रभाव डालने का सबसे अच्छा उपाय है। अपना मतलब निकालने का सबसे अच्छा तरीका किसी की नकल करना नहीं, बल्कि उसकी बातें सुनना है, जब आप दूसरे की बातों पर ध्यान नहीं  देते हैं, तो आप हाव-भाव से यह प्रकट करते हैं कि आप उसके बातों को अधिक महत्व नहीं देते हैं, तो आप हाव भाव से प्रकट करते हैं, कि आप उसकी बात को बहुत महत्व नहीं दे रहे हैं। अच्छा तो यह है, कि आप उसकी बात को ध्यान से सुने और अपने से उसके महत्व को प्रकट करें, ताकि वह आप में कुछ ज्यादा दिलचस्पी लें। 

जब इंटरव्यू आदि के लिए जाते हैं

 बहुत से युवा जब इंटरव्यू आदि के लिए जाते हैं , तो उनका प्रयास यही रहता है, कि वह सामने वाले को अत्यधिक प्रभावित करें। और इसके लिए वह बहुत ज्यादा स्मार्ट , वाकपटु और मनोरंजक दिखने का प्रयास करते हैं। किंतु यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो आपके मन में सामने वाले की बात पर ध्यान केंद्रित करने की इच्छा होने चाहिए। 

प्रभावित करने की कोशिश करने के बजाय स्वयं प्रभावित हों


   आपको चाहिए कि आप को प्रभावित करने की कोशिश करने के बजाय स्वयं प्रभावित हों। तथा रोचक बनाने की कोशिश करने के बजाय उसकी बातों में रुचि लें, याद रखिए आप जिस व्यक्ति से भी मिलते हैं, वह किसी न किसी मामले में आपसे श्रेष्ठ हो सकता है। और आप उससे सदा कुछ सीख सकते हैं। यदि आप यह चाहते हैं, कि लोग आपकी बातों को सुनने में उत्सुकता दिखाएं, तो सदा सुनने की आदत डालिए। 


 अपनी सुनने की आदत से आप दूसरों के साथ कई स्तरों पर जुड़ सकते हैं। 

क्योंकि आप उनकी एक अहम आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है। जो सचमुच उसकी बात सुनता हो। 

   एक कोच अपने अधिनस्थ खिलाड़ी को बार-बार कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था । लेकिन खिलाड़ी हर बार उसके बात को बीच में काट देता, और अपनी कमियों को कम और खूबियों को ज्यादा बताने की कोशिश करने लगता। जब वह अपनी हरकतों से बाज ना आया तो कोच ने भी स्वीकृत में सिर हिलाने लगा। 


   एक सीनियर खिलाड़ी बड़े ध्यान से उनकी बातों को ध्यान से सुन रहा था। उसने कोच को अकेला पाकर उससे पूछा, " आपने उस खिलाड़ी की बात क्यों स्वीकार कर लिया, जबकि आप जानते थे कि वह गलत है। "

 कोच ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया मुझे यह पता चल गया था, कि इस मूर्ख इंसान से बहस करना मूर्खता ही होगी। मैंने स्वीकृत देकर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। 

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अपने को सामने वाले के अक्लमंद दिखाना, अच्छी बात नहीं है। 

बल्कि सामने वाले की बातों से अक्ल लेना अच्छी बात है। बैंक का एक मैनेजर अपने अधीनस्थों की बातें कम सुनने वाला हो सकता है, लोगों की यह आदत बन जाती है, कि वह जितने बड़े अधिकारी होते जाएंगे, दूसरों की बात सुनने के लिए उतने ही कम बाध्य होंगे। किंतु इसके साथ ही सुनने में नहीं पड़ता, कि उनकी आवश्यकता भी उतनी ही बढ़ जाएगी, आप जितने बड़े अधिकारी बनते जाते हैं, विश्वसनीय जानकारी पाने के लिए आपको दूसरों पर उतना ही अधिक निर्भर होना पड़ता है। अपने जीवन में सफल होने के लिए जिस जानकारी की आवश्यकता है, उसे आप तभी प्राप्त कर सकेंगे, जब सुनने की आदत डालने और अधिकाधिक उसका प्रयोग करें। 


 बड़ी-बड़ी कंपनियों और फैक्ट्रियों में कर्मचारियों की बातें विशेषता सुनी जाती है, 

ध्यान रखें जब दूसरों की बात आप ध्यान से सुनते हैं, तो आपके पास विचारों की कोई कमी नहीं होती। कर्मचारी तभी सहयोग देना पसंद करते हैं, जब अधिकारी उनकी बात को तवज्जो देता हो, यदि आप लोगों को अपने विचार बताने का अवसर देते हैं, और खुले दिमाग से उसे सुनते हैं, तो सदा नवीन विचारों का प्रवाह बना रहेगा। कभी कभार बेकार के विचार सुनने से भी उसमें काम की कोई बात निकल आती है। इसीलिए ज्यादा कहने की अपेक्षा ज्यादा सुनना हमेशा फायदेमंद साबित होता है। 


   जो आपसे बतियाना चाहता है, अगर आप उसकी बात पर ध्यान नहीं देंगे, तो अपनी बात को कहने वाले किसी दूसरे को ढूंढ लेंगे। क्योंकि मन की बात वह किसी से कह आवश्यक देना चाहता है। एक पुत्र की बात को जब उसका पिता नहीं सुनता, तो अपनी बात वह माता से कह देता है। क्योंकि अपनी बात कहे बिना नहीं रह सकता। 


 अच्छे वक्ता यह जानते हैं, कि बोलने और सुनने के अनुपात पर दृष्टि रखना आवश्यक है। अमेरिका के एक कुशल लीडर और वक्ता राष्ट्रपति लिंकन ने कहा था, जब मैं किसी व्यक्ति से तर्क करने की तैयारी करता हूं, तो अपने बारे में और मेरे द्वारा कही जाने वाली बातों के बारे में सोचने में एक तिहाई वक्त लगाता हूं।   यह एक अच्छा अनुपात है, यानी कम बोले और ज्यादा सुनें

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