प्रारंभिक भारतीय इतिहास में लोगों के जीवन-निर्माण में पर्यावरण संवंधी परिस्थितियों का क्या महत्व था

प्रारंभिक भारतीय इतिहास में लोगों के जीवन-निर्माण में पर्यावरण संवंधी परिस्थितियों का क्या महत्व था

प्रारंभिक भारतीय इतिहास में लोगों के जीवन-निर्माण में पर्यावरण संवंधी परिस्थितियों का क्या महत्व था




भारत का इतिहास इसके भूगोल के सामान्य ज्ञान के बिना समझा नहीं जा सकता। भारत मानूसन के ज्ञान के फलस्वरूप पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार करने और सांस्कृतिक सम्पर्क स्थापित करने में समर्थ हो गया। भारत उत्तर में हिमालय से और शेष तीन दिशाओं में समुद्रों से घिरा है। 



हिमालय साइबेरिया से चलकर मध्य एशिया को पार करने वाली उत्तरधुव्रीय ठंडी हवाओं को रोकता है और इस प्रकार हमारे देश की रक्षा करता है । दक्षिण की ओर सुलेमान पर्वत श्रृंखला बलूचिस्तान में किरथर पर्वत श्रृंखला से जुड़ी है, जिसे बोलन दरें से पार किया जा सकता था। इन दरों से भारत और मध्य एशिया के बीच प्रागैतिहासिक काल से ही आवागमन होता आया है । ये दरें एक ओर भारत और दूसरी ओर मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापारिक तराइयों में ही पश्चिम से पूर्व और पूर्व से पश्चिम की ओर विकसित हुए। 



संभवत: इन्हीं कारणों से ईसा पूर्व छठी सदी में सबसे पुरानी कृषि बस्तियाँ तराई वाले इलाकों में ही बनीं और यहीं के रास्ते व्यापार के लिए अपनाए गए। सिंधु और गंगा के मैदानों में शुरू हुई खेती से यहाँ बढ़िया फसल होने लगी और इसने एक के बाद एक कई संस्कृतियों का संभरण किया। सिंधु और गंगा के पश्चिमी मैदानों में मुख्यत: गेहूँ और जौ की उपज होती थी, जबकि मध्य तथा निम्न गंगा मैदानों में मुख्यत: चावल पेदा किया जाता था। चावल गुजरात और विंध्य पर्वत के दक्षिण के लोगों का भी मुख्य भोजन बन गया। 


संस्कृति का उद्भव और विकास



हडप्पा संस्कृति का उद्भव और विकास सिंधु की घाटी में हुआ, वैदिक संस्कृति का उद्भव पंजाब में हुआ और विकास पश्चिमी गंगा घाटी में। आदिकोत्तर संस्कृति, जो मुख्यत: लोहे के प्रयोग पर आश्रित थी, मध्य गंगा घाटी में फूली-फली। निদ गंगा घाटी और उत्तरी बंगाल को वास्तव में गुप्त युग में उत्कर्ष मिला। अंत में, असम सहित समूची ब्रह्मपुत्र घाटी को आरंभिक मध्य युग में महत्व प्राप्त हुआ। प्रमुख शक्तियाँ इन घाटियों और मैदानों पर प्रभुत्व पाने के लिए आपस में लड़ती रहीं । इनमें भी ये शक्तियाँ गंगा-यमुना दोआव के लिए विशेष लोलुप रहीं और इसके लिए संघर्ष भी खूब हुए। नदियाँ वाणिज्य और संचार की मानो धरमनियाँ थीं । 


प्राचीन काल में सड़क



प्राचीन काल में सड़क बनाना कठिन था, इसलिए आदमियों और वस्तुओं का आवागमन नावों से होता था। अत: नदी मार्ग सैनिक और वाणिज्य संचार में बड़े ही साधक हुए । अशोक द्वारा स्थापित प्रस्तर स्तम्भ नावों से ही
देश के दूर-दूर स्थानों तक पहुँचाए गए। संचार-साधन के रूप में नदियों की यह भूमिका ईस्ट इंडिया कंपनी के दिनों तक कायम रही। इसके अलावा, नदियों की वाढ़ का पानी आसपास के क्षेत्रों में फैलता था और उन्हें उपजाऊ बनाता था। इन नदियों से नहरें भी निकाली गई थीं। सबसे बढ़कर, नदियों ने राजनैतिक और सांस्कृतिक सीमाओं का काम किया है। यह काम पर्वतों ने भी किया है। इसी प्रकार आंध्र प्रदेश के उत्तर में गोदावरी और दक्षिण में कृष्णा है। इन दोनों नदियों के मुहानों के मैदान को ईस्वी सन् के आरंभ काल में अचानक ऐतिहारिक महत्व मिला, जब सातवाहनों और उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में यहाँ अनेक नगर और बंदरगाह स्थापित हुए। 


तमिलनाडु ने, जो उच्च भूमि वाला प्रदेश ,पल्लव शासन काल में ईसा की चौथी-छठी सदियों में प्रसिद्धि पाई। आरिकमेडु ( आधुनिक नाम), महावलिपुरम और कावेरीपट्टनम के बंदरगाह कोरोमंडल पर ही अवस्थित थे दक्षिण में सीमा के बीच का प्रदेश महाराष्ट्र के रूप में पहचाना जा सकता है। उत्तर में भीमा और ऊपरी कृष्णा तथा दक्षिण में तुंगभद्रा के बीच का प्रदेश कर्नाटक के रूप में पहचाना जा सकता है । प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण-पश्चिम के तटीय प्रदेश में आजकल का केरल राज्य है। राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी भाग प्राचीन काल से ही अपेक्षाकृत उपजाऊ रहा है । इसके अलावा, खेतड़ी की ताँबे की खानें भी उसी क्षेत्र में होने से वहाँ में ताम्र-पाषाण युग से ही बस्तियां बनती रही हैं।


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