उत्तर वैदिक काल में लोगों के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन में क्या परिवर्तन हुए

उत्तर वैदिक काल में लोगों के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन में क्या परिवर्तन हुए

उत्तर वैदिक काल में लोगों के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन में क्या परिवर्तन हुए


धार्मिक जीवन


वैदिक काल में लोगों के धार्मिक जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन-दिखाई देता है। नवीन धार्मिक स्थितियों में तीन स्पष्ट प्रवत्तियों को देखा जा सकता है। पहला इस काल में ऋग्बैदिक देवी-देवता जैसे इंद्र, वरुण आदि का महत्व कम होता गया। उत्तर वैदिक काल में रुद्र के साथ विष्णु का महत्त्व बढ़ गया। तग्वैदिक काल में वरुण का जो स्थान था, उत्तर वैदिक काल में वह स्थान विष्णु को प्रापत हो गया। विष्णु सभी देवताओं में सबसे सम्माननीय और श्रेष्ठ माने जाने लगे। 


दूसरा, ऋष्वैदिक काल


में यज्ञ की विधि वहुत सरल और सादी थीं, उसको करने के लिए किसी तरह के तामझाम की आवश्यकता नहीं होती थी। उत्तर बैदिक काल में यज्ञों का नियमन होना शुरू हो गया। यज्ञों की संख्या में बहुत तेज वृद्धि हुई,  क्रिया को पेचीदा और खर्चीता बनाया गया मध्यस्थ की भूमिका में पुराहितों का महत्व यढ़ गया, जो ऋग्वैदिक काल में नहीं था उन्तर वैदिक काल के यज्ञां में पशुवलि भारी मात्रा में होटी शुरू हो गयी। 


तीसरा, उत्तर बैदिक काल 



उत्तर बैदिक काल में धार्मिक धारणाओं और कर्मकांडों में भारी बदलाव आया। भूत-प्रेत, जादू-टोने, इंद्रजाल, यशीकरण, आदि के मंत्र की रचना इस काल की विशेषता है । अथर्दवंद में भूत-प्रेतों और उनसे रक्षा करने के लिए ढंर सारे मंत्र संकलित किये गये हैं इस काल में इस विश्वास ने भी जड़ जमाया कि तंत्र-मंत्र से देवताओं को वश में करने के साथ-साथ उन्हें नट भी किया जा सकता है। इस प्रकार प्रावैदिक काल की अगेकषा उत्तर वैदिक काल में धार्मिक स्तर पर जटिलता, आडम्बर और दिखावा तेजी से बढा। 


ऋग्वैदिक काल की धार्निक सादगी घीरे- धीरे समाप्त हों गई। आर्थिक जीवन-कृषको, पशुपालकों, व्यापारियों आदि की सफलता एवं समृद्धि के लिए अथर्ववेद में दी गई अनेक प्रार्थनाओं से तत्कालीन आर्थिक समृद्धि के विकार का पता चलता है। ऐसो प्रार्थनाएँ खेंत की जोताई, बीजों की बांआई, यर्षा, पशुयन और संपत्ति में बद्रोतरो और हानि प्ुँचाने वाले जीव जंतुओं, जंगलो जानवरों, डाकू-तुटेरों और ऐसे हो अन्य हानिकारक तत्वों को दूर भगाने या उनसे बचने के लिए की जाती थीं। हल को सिरा और हलरेखा को सीता कहा जाता था। गोवर को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता था। 


हल में छः, आठ और यहाँ तक की चौबीस बैल जाते जानें का उल्लंगख है। अनेक प्रकार के खाद्यान्न; जैसे-चावल, जी, फलियाँ और तिल उगाए जाते थे। उनके लिए उपयुक्त ऋतुओं का भी उल्लेख है; जैसे-जौ सर्दियों में उगाया जाता था और गर्मियों में पकने पर काटा जाता था; चावल/ धान वर्षा ऋतु में बोया जाता था और शरद ऋतु में काटा जाता था। शतपथ ब्राह्मण में कृषि की कई क्रियाओं; जैसे-जोताई, बोआई, कटाई और गहाई आदि को गिनाया गया था।


खेती को तुकसान पहुँचाने वाले कई जीव-जंतुओं का नष्ट कर देते थे और अन्य जीवन कोमल अंकुरों को काट डालते थे तथा अतिवृष्टि से खेतो को हानि पहुँचती है। पशुधन को बहुत महत्त्व दिया जाता था और अथर्वेद का एक काफी लंबा मंत्र यह दर्शाता है कि गायों को पूज्य माना जाता था और गोहत्या के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था थी। अनेक संदर्भों में धनी वणिकों एवं व्यापारियों का उल्लेख मिलता था व्याज पर ऋण दिया जाता था। तौल और माप की विशिष्ट इकाइयों का भी प्रयोग होता था निष्क और शतमान मुद्रा की इकाइयाँ धीं, लेकिन उत्तर वैदिक काल में किसी खास भार, आकृति और मूल्य के सिक्कों के चलन का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। 


बाजार में मोल-भाव करने का रिवाज ऋा्वैदिक काल से ही चला आ रहा था। समुद्री मार्ग से भी व्यापार की जानकारी थी और ऐतरेय ब्राह्मण में अथाह, अनंत जलधि और पृथ्नी को घेरने वाले समुद्र उल्लेख मिलता है; जैसे छदछूदर बीज को का उल्लेख है। बलि पहले राजा या मुखिया को स्वेच्छा से भेंट के रूप में दी जाती थी, लेकिन अब उसने नियमित कर का रूप धारण कर लिया था और उसे राजनीतिक तथा प्रशासनिक ढाँचे के रख-रखाव के लिए बाकायदा वसूल किया जाने लगा था। उद्योग और काम-धंधों में अब उल्लेखनीय विकास हो चुका था। 



इस काल में हम मछुआरों, वनपालों, धोबियों, नाइयों, कसाइयों, हाथी पालकों, महावतों, पदातियों, संदेशवाहक, आभूपण, टोकरियाँ, रस्सियाँ, रंग, रथ, धनुष आदि बनाने वालों, सुनारों, लोहारों, कुम्हारों आदि का उल्लेख पाते हैं। व्यापारियों, वणिक श्रेणियों, सार्थवाहों और समुद्री व्यापार का भी अनेक स्थलों पर उल्लेख किया गया है । शिल्पियों की श्रेणियाँ भी अस्तित्व में आ चुकी थीं। श्रेणी (गिल्ड) के मुखिया श्रेप्ठि का भी अनेक प्रसंगों में उल्लेख
मिलता है। ऋग्वैदिक काल में हम अयस् का भी उल्लेख पाते हैं, जिसका अर्थ ताँबा/काँसा लगाया गया है। इस
युग में नई धातु अर्थात् लोहे के आविष्कार से हम श्याम अयस् (लोहा) और लोहित अवस् (ताँबा) शब्द का भी उल्लेख पाते हैं। इनके अलावा सोने, सीसे, और वंग (राँगे) का भी उल्लेख पाया जाता है। लोहे का इस्तेमाल हथियार और नहरने, हथौड़े चिमटे, हल की फाल आदि वस्तुएँ बनाने के लिए किया जाता था। ताँवे से बर्तन बनाए जाते थे। सोने और चाँदी का उपयोग आभूषण तथा प्लेटें आदि बनाने के लिए किया जाता था।


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